प्रथम दैवी शिक्षक
प्रथम धर्म ग्रंथों में इन धर्म संस्थापकों को आदित्य (सूर्य), आदिम या आदम कहा गया है। गीता मैं थर्म की उत्पत्ति सूर्य या आदित्य ऋषि से बताई गई है। आदम शब्द आरबी के 'आद' शब्द से बना है जिसका अर्थ सूर्य है। अस्तु, यह अनुमान किया जा सकता है कि यह आदम ही आदिम अथवा आदित्य (सूर्य) रहे हो। इन्ही को शास्त्रों में विवस्वान भी कहा गया है।
इन्ही विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु को ईश्वरीय अवतार कहा गया है। इनके विषय में यह पुराणाख्या प्रसिद्ध है कि एक बहुत बडा़ जलप्रलय इनके जीवन काल में हुआ था, जिसमें तत्कालीन मानव बस्तियाँ, ग्राम, नगर, आदि जल में डूब गये थे। तब ईश्वराज्ञा से इन्होंने एक बहुत बडी़ नौका का निर्माण किया था। इसमें अनेक मानव वंशों के जनक सप्तऋषियों, पशु-पक्षियों तथा अनाजों व औषधयों के बीजों को रखकर सृष्टि के बीज तत्व की रक्षा की थी। प्राय सभी प्राचीन धर्म ग्रंथों में थोडे़ बहुत अन्तर से इस जलप्लावन की कथा मिलती है। बाइबिल के ओल्ड टैस्टामेन्ट की 'जैनेसिस' नामक पुस्तक में इन्हीं मनु को नोहा कहा गया है। इस्लामिक धर्म शास्त्रों में यही मनु-नोह से हज़रत 'नू' बन गये हैं। आश्चर्य है कि हजारों वर्षों के अन्तराल के पश्चात भी इस कथा तथा उसके नायक के नामों के उच्चारण में कितना साम्य है। प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डाॅ. लियोनार्ड वूली ने इस जल प्रलय के स्थान का पता लगाकर अकाट्य पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर इसे इराक व ईरान के मध्य स्थिर किया है।
यही मनु, नोह अथवा नू, वर्तमान सभी मानव के वंश के संस्थापक थे। वे ही उस समय के सभी मानवों के एकमात्र 'दिव्य शिक्षक', थर्म संस्थापक अथवा ईश्वरीय अवतार थे। हिन्दु धर्म का प्रसिद्ध स्मृति-ग्रंथ, 'मनुस्मृति' इनही की दी हुई महान धर्म व्यवस्था है। अतः निर्विवाद रूप से यह सिद्ध किया जा सकता है कि मनु के वंशज मानव एक ही थर्म के अनुयायी थे। वे सब परस्पर प्रेम व भाईचारे की भावना से इस धरती पर एक साथ रहते थे। उनका एक ही कानून तथा एक ही संस्कृति थी। धर्मग्रन्थों में आगे की घटना इस प्रकार बताई जाती है। बाईबिल में भी जिसका उल्लेख है कि ईश्वरीय प्रेरणा से समस्त मानव-वंश इस पृथ्वी पर, दूर-दूर तक बसा दिये गये और धीरे-धीरे उनकी भाषाऐं भी बदलती चली गई। ऋतुओं की भिन्नता के कारण उनके शरीर की बनावटों व रंगों में अन्तर आ गया। कालान्तर में भौगोलिक कारणों से इन सबका परस्पर सम्पर्क कम होते-होते बिल्कुत ही टूट गया।
धर्मों का स्त्रोत स्थल
वर्तमान इतिहास के अनुसार धर्म के ये तीनों स्त्रोत-स्थल क्रमशः सामी देश, ईरान तथा भारत माने जाते है। इन्हीं तीनौं स्थानों से मुख्यतः थर्म की तीन तथा कालान्तर में सात धर्म धाराएं चलीं, जो पुराणों में 'सप्त गंगा' के नाम से प्रसिद्ध है। ये 'सप्त गंगा' अन्य कुछ नहीं इस विश्व के सात प्रमुख धर्मों की भविष्यवाणियां हैं जो इस समय निम्न नामों से जानी जाती है :
1. साबी धर्म (अफ्रीका)
2. सनातन धर्म अथवा वैदिक थर्म
3. बोद्ध धर्म
4. यहूदी धर्म
5. पारसी धर्म
6. ईसाई धर्म
7. इस्लाम धर्म ।
(Source: "Kalki Avatar" by Mr. Prakash Narayan Mishra)