Saturday, March 11, 2023

ईश्वर का अस्तित्व (4)

 प्रथम दैवी शिक्षक
      प्रथम धर्म ग्रंथों में इन धर्म संस्थापकों को आदित्य (सूर्य), आदिम या आदम कहा गया है। गीता मैं थर्म की उत्पत्ति सूर्य या आदित्य ऋषि से बताई गई है। आदम शब्द आरबी के 'आद' शब्द से बना है जिसका अर्थ सूर्य है। अस्तु, यह अनुमान किया जा सकता है कि यह आदम ही आदिम अथवा आदित्य (सूर्य) रहे हो। इन्ही को शास्त्रों में विवस्वान भी कहा गया है।
      इन्ही विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु को ईश्वरीय अवतार कहा गया है। इनके विषय में यह पुराणाख्या प्रसिद्ध है कि एक बहुत बडा़ जलप्रलय इनके जीवन काल में हुआ था, जिसमें तत्कालीन मानव बस्तियाँ, ग्राम, नगर, आदि जल में डूब गये थे। तब ईश्वराज्ञा से इन्होंने एक बहुत बडी़ नौका का निर्माण किया था। इसमें अनेक मानव वंशों के जनक सप्तऋषियों, पशु-पक्षियों तथा अनाजों व औषधयों के बीजों को रखकर सृष्टि के बीज तत्व की रक्षा की थी। प्राय सभी प्राचीन धर्म ग्रंथों में थोडे़ बहुत अन्तर से इस जलप्लावन की कथा मिलती है। बाइबिल के ओल्ड टैस्टामेन्ट की 'जैनेसिस' नामक पुस्तक में इन्हीं मनु को नोहा कहा गया है। इस्लामिक धर्म शास्त्रों में यही मनु-नोह से हज़रत 'नू' बन गये हैं। आश्चर्य है कि हजारों वर्षों के अन्तराल के पश्चात भी इस कथा तथा उसके नायक के नामों के उच्चारण में कितना साम्य है। प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डाॅ. लियोनार्ड वूली ने इस जल प्रलय के स्थान का पता लगाकर अकाट्य पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर इसे इराक व ईरान के मध्य स्थिर किया है।
      यही मनु, नोह अथवा नू, वर्तमान सभी मानव के वंश के संस्थापक थे। वे ही उस समय के सभी मानवों के एकमात्र 'दिव्य शिक्षक', थर्म संस्थापक अथवा ईश्वरीय अवतार थे। हिन्दु धर्म का प्रसिद्ध स्मृति-ग्रंथ, 'मनुस्मृति' इनही की दी हुई महान धर्म व्यवस्था है। अतः निर्विवाद रूप से यह सिद्ध किया जा सकता है कि मनु के वंशज मानव एक ही थर्म के अनुयायी थे। वे सब परस्पर प्रेम व भाईचारे की भावना से इस धरती पर एक साथ रहते थे। उनका एक ही कानून तथा एक ही संस्कृति थी। धर्मग्रन्थों में आगे की घटना इस प्रकार बताई जाती है। बाईबिल में भी जिसका उल्लेख है कि ईश्वरीय प्रेरणा से समस्त मानव-वंश इस पृथ्वी पर, दूर-दूर तक बसा दिये गये और धीरे-धीरे उनकी भाषाऐं भी बदलती चली गई। ऋतुओं की भिन्नता के कारण उनके शरीर की बनावटों व रंगों में अन्तर आ गया। कालान्तर में भौगोलिक कारणों से इन सबका परस्पर सम्पर्क कम होते-होते बिल्कुत ही टूट गया।

धर्मों का स्त्रोत स्थल
      वर्तमान इतिहास के अनुसार धर्म के ये तीनों स्त्रोत-स्थल क्रमशः सामी देश, ईरान तथा भारत माने जाते है। इन्हीं तीनौं स्थानों से मुख्यतः थर्म की तीन तथा कालान्तर में सात धर्म धाराएं चलीं, जो पुराणों में 'सप्त गंगा' के नाम से प्रसिद्ध है। ये 'सप्त गंगा' अन्य कुछ नहीं इस विश्व के सात प्रमुख धर्मों की भविष्यवाणियां हैं जो इस समय निम्न नामों से जानी जाती है :
                1. साबी धर्म (अफ्रीका)
               2. सनातन धर्म अथवा वैदिक थर्म
               3. बोद्ध धर्म
               4. यहूदी धर्म
               5. पारसी धर्म
               6. ईसाई धर्म
               7. इस्लाम धर्म ।


(Source: "Kalki Avatar" by Mr. Prakash Narayan Mishra)

Wednesday, March 1, 2023

ईश्वर का अस्तित्व (3)

 धर्म संस्थापक

धर्म का यह पथ मनुष्य स्वयं ढूँढ़ने में असमर्थ है। उसके भौतिक चक्षु उसकी खोज में, उसकी तुच्छ बुद्धि उसे जानने, समझने और इसके अनुकूल चलने में सर्वथा असमर्थ है। अतः ईश्वर ने मनुष्य को इस सम्बन्ध में असहाय और अकेला नहीं छोडा़ है। जिस प्रकार उसने मनुष्य की भौतिक सुख-शांति के लिए इस जगत में अनेकानेक पदार्थों की सृष्टि की है उसी प्रकार उसकी आध्यात्मिक उन्नति में उसकी सहायता करने, उसे सही दिशा देने का भी उसने प्रबन्ध किया है। उसने मानव जगत को वचन दिया है कि जब-जब संसार में धर्म की ग्लानि होकर अधर्म और पाप बढ़ जाएगा, तब-तब धर्म की रक्षा करने, उसका संस्थापन करने इस संसार में उसका प्रकटीकरण होता रहेगा। गीता में भगवान कृष्ण ने जगत को यही वचन दिया है :

      यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानर्भवति भारत ।
      अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यह्म ।।7।।
      परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम ।
      धर्मसंस्थापनार्थय सम्भवामि युगे युगे ।।8।।
                                  श्रीमद्भगवद् गीता (अध्याय 4)



दैवी शिक्षक

मानव- जगत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि इस पृथ्वी पर सदैव ही ये दैवी शिक्षक आते रहे हैं। प्राचीन धार्मिक ग्रंथ इस बात को प्रमाणित करते हैं कि सृष्टि के आदि काल से ही ईश्वरीय अवतार इस पृथ्वी पर प्रकट होते रहे हैं। मानव सृष्टिकी उत्पत्ति पर हम विचार करें तो हमें ज्ञात होगा कि इस पृथ्वी का सम्पूर्ण मानव-समुदाय एक ही पिता की सन्तानों के रूप में पृथ्वी पर बसा हुआ है। प्राचीन हिन्दू ग्रंथ इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि और उनके पुत्र कश्यप ऋषि ही सम्पूर्ण मानव वंशों के पिता थे। उनकी तेरह पत्नियों से कतिपय मानव वंशों की उत्पत्ति हुई है। पुराणाख्याओं में दिति नाम की पत्नी के दैत्य, अदिति के आदित्य और दनु के दानव आदि मानवों की उत्पत्ति का इतिहास दिया हुआ है। इन्हीं मानव वंशों को इस पृथ्वी पर तीन लोकों में बसाया गया था जिन्हें 'त्रिलोकी' कहा गया है। जिस समय ये मानव वंश एक ही स्थान पर निवास करते थे तब उनका एक ही परिवार और उसी प्रकार उनका एक ही दैवीशिक्षक अथवा धर्म संस्थापक था।



(source: 'Kalki Avatar' by Mr. Prakash Narayan Mishra)

Saturday, February 11, 2023

ईश्वर का अस्तित्व (2)


मानवात्मा

      क्या उस स्रष्टा की सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य को जन्म देने मैं भी उसका कोई प्रयोजन है? अथवा निष्प्रयोजन ही इस धरती पर उसकी सृष्टि की गई है। गहराई से इस पर विचार करें तो हमें ज्ञात होगा कि उस नियन्ता का मानव को इस संसार में जन्म देने, उसे एक निश्चत जीवन देने और अन्त में मृत्यु द्वारा उहका वह शरीर भी नष्ट कर देने में अवश्य ही कोई बहुत ही बडा़ प्रयोजन है। निश्चय ही इस नश्वर शरीर से परे भी कोई वस्तु है जो इसके नाश होने पर भी नष्ट नहीं होती है। वह है "मानवात्मा" जो कभी मरती नहीं, जलती नहीं, कभी नष्त नहीं होती। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है :

          नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि नैनं दहति पावकः।
          न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।। 2-23।।


धर्म का प्रयोजन

यही 'मानवात्मा' इस संसार में मनुष्य शरीर धारण करके अनेकानेक भोगों को भोगती है। ईश्वरेच्छा से ही उसे जीवन-यापन के अनेक साधन उपलब्ध कराये जाते हैं किन्तु उसका साध्य कुछ और ही है जो अत्यन्त ही महत्वपूर्ण और महान है। वह है इस संसार में कर्मों के द्वारा उस आत्मा की निरन्तर आध्यात्मिक उन्नति, जो उसे उसके परम लक्ष्य 'भगवद्प्राप्ति' में सहायक हो सके। जब-जब मनुष्य इस संसार के भौतिक प्रलोभनों में फंस पथ-भ्रष्ट होकर अपने इस चरम लक्ष्य को विस्मृत कर देता है तब-तब धर्म ही एक ऐसा साधन है जो उसे दिशाहीन होकर भटकने से रोकता है, उसका पथ निर्दिष्ट करता है और लक्ष्य प्राप्ति में उसका सहायक होता है।



(source: Kalki Avatar by Prakash Narayan Mishra)