सृष्टि के कार्यकलापों पर विचार करें तो हमें ज्ञात होगा कि इसके प्रत्येक अवयव में एक व्यवस्था है। उदाहरण के लिए उस सृष्टि की एक महान रचना सूर्य को देखिये — वह अपने निश्चित समय पर प्रातः क्षितिज से उदित होता हुआ दिखाई देता है और सांयकाल एक निश्चित समय पर अस्त हो जाता है। हर ऋतु में वह एक निश्चित स्थान पर दिखाई देता है जो पृथ्वी पर ऋतुओं की सृष्टि करता है। इसी कारण समय पर ग्रीष्म, वर्षा और तत्पश्चात शरद और हेमन्त आदि ऋतुओं का आगमन होता है। मानव के जन्म पर ही विचार करें तो उसके भी शरीर धारण करने और जन्म लेने की प्रक्रिया में एक व्यवस्था दिखाई देती है। सृष्टि की यही व्यवस्था हमें सोचने को विवश करती है कि इस सम्पूर्ण सृष्टि रचना के पीछे अवश्य ही कोई एक विशाल मस्तिष्क सदैव कार्यरत है। वही स्रष्टा या परमत्मा के नाम से जाना जाता है। उसे हम देख नहीं सकते, मात्र उसकी अपरिमित शक्तियों को देख कर उसकी विद्यमानता का अनुभव कर सकते है। इसी प्रकार हम अनुभव द्वारा यह भी ज्ञात कर सकते हैं कि इस सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप की पृष्ठभूमि में उस स्रष्टा का निश्चय ही कोई न कोई प्रयोजन है।
Monday, January 30, 2023
Saturday, January 21, 2023
प्रेरणादायक कहानी - 3
तुर्की और ईर्न के मध्य युद्ध हुआ। युद्ध में तुर्की की सेना ने ईरान के सूफी संत फरीदुद्दीन को पकड़ लिया और उन्हे कारावास में डाल दिया। इस समाचार को सुनकर ईरान की जनता दुःखी हो गई और अपना क्षोभ व्यक्त करने जनसमूह ईरान के शाह से मिलने पहुँचा। उनकी फरीयाद सुनकर ईरान के शाह ने तुर्की के सुल्तान को प्रस्ताव भेजा कि वे सारा राज्य ले लें, पर संत को छोड़ दें।
तुर्की का सुल्तान यह प्रस्ताव सुनकर घोर आश्चर्य में पड़ गया और उसने दूत के माध्यम से प्रश्न कराया कि जिस राज्य को वे लड़कर युद्ध में न जीत सके, उसे वे एक आदमीत्रके बदले क्यों देने को तैयार हैं? ईरान के शाह ने कहा — "राज्य आते-जाते रहते हैं, पर संत अमर हैं। संत को खोकर मिला राज्य मूल्यहीन है, पर संत बहुमूल्य हैं।" यह सुनकर तुर्की के सुल्तान की आँखें खुल गईं। वह जान गया कि जिस देश में संतों का इतना आदर है, उसे जीत पाना संभव नहीं। उसने संत को आदरपूर्वक छोड़कर ईरान से संधि कर ली।
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कल्कि अवतार (भुमिका)
जब से इस देश में कल्कि अवतार विषयक विभिन्न पुस्तकों का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ और जनता को यह ज्ञात हुआ कि कल्कि अवतार के प्राकट्य का समय व्यतीत हो चुका है, तभी से नकली अवतारों की बाढ़ सी आ गई है। पिछले ईश्वरीय अवतारों की कथाएँ पढ़कर तथा उनकी लीलाएँ देखकर, लोग उसी भाँति की कल्पना के अनुरुप आज के ईश्वरीय अवतार को देखने की आशा करते हैं। लोगों की इस मनोवृत्ति को धोखा देकर दम्भी और ढोंगी स्वयं को अवतार के रूप में प्रसिद्ध कर उन्हें ठग रहे है। समय-चक्र बडा़ बलवान है, ऐसे अनेक ढोंगियों का भाण्डा फूट चुका है और आज उनके अस्तित्व तक का पता नहीं है।
आज मानव समाज अपने दुःखों से त्रस्त है अतः इधर-उधर भटकता फिरता है। दिग्भ्रमित लोगों को इस पशोपेश की स्थिति से निकालकर सही दिशा निर्देश देना हम अपना सर्वोच्च कर्त्तव्य समझते है।
सन 1972 में लेखक की इसी विषय की पुस्तक "कल्कि अवतार की खोज" प्रकाशित हुई थी तथा उस पुस्तख की सभी प्रतिया़ँ हाथों हाथ समाप्त हो गई। तभी से उसके द्वितीय संस्करण के प्रकाशन की माँग पर माँग आ रही थी। अतः इस विषय की सभी आवश्यक बातों को संक्षेप में इस पुस्तक "काल्कि अवतार" के पाठकों की सेवा में प्रस्तुत है।
लेखक का यह प्रयास सागर में एक बूंद के समान है क्योंकि इस सम्बन्ध की विशाल सामग्री संतवाणियों के रूप में अनेकानेक भारतीय भाषाओं में बिखरी पडी़ है। इस देश के भावी श्रद्धालु, खोजी विद्वान निःसंदेह बडे़ यश के भागी होंगे जो उस सामग्री को प्रकाश में लाएंगे।
जिनकी कृपा से मूक वाचाल हो जाते हैं और पंगु ऊँचे-ऊँचे पर्वतों पर भी चढ़ जाते हैं, उन भगवान 'दयाल' को, जो सर्व कलियुग के पापों को नष्ट करने वाले है, मैं नमस्कार करता हूँ। द्वापर युग में प्रकट होने वाले वेद व्यास, महर्षि कृष्ण द्वैपायन, जिन्होंने संसार के लिए उस ईश्वरीय ज्ञान को सुलभ करके वेदों का सम्पादन किया तथा अनेकानेक रहस्यों से युक्त पुराणों की रचना की। उन दिव्य ज्ञानी 'कलाप' ग्राम स्थित साक्षात ज्ञानस्वरूपा को मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ। उन सब देवात्माओं को, जिन्होंने कलियुग के प्रतीक्षाकाल में इस पृथ्वी पर जन्म लिया और अपने उपदेशों द्वारा समस्त जनों को भक्ति तथा मानवीय एकता की शिक्षा दी, मैं नमस्कार करता हूँ। कल्कि अवतार के साथ प्रकट होने वाले प्रातः स्मरणीय उन अनेक संतों (ऋषियों) को जो उनके नाम पर बलिदान हो गये को मैं नमस्कार करता हूँ।
प्रभुधर्म की सेवा मे
प्रकाश नारायण मिश्र
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Friday, January 13, 2023
प्रेरणादायक कहानी - 2 (भगवान बुद्ध की कहानी)
भगवान बुद्ध से उनके एक शिष्य ने प्रार्थना को — "प्रभु! मुझे ऐसे स्थान पर जाने की आज्ञा प्रदान करें, जहाँ के लोग स्वभाव से क्रूर हों।" भगवान बुद्ध ने परीक्षा लेने के उद्देश्य से उससे कहा — "वत्स! वे लोग तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करेंगे, तुम्हें अपशब्द कहेंगे।" शिष्य बोला — "भगवान्! सहन करने से व्यक्तित्व परिष्कृत होता है, मैं उनका उपहार मानूँगा।" भगवान बुद्ध ने पुनः प्रश्न किया — "और यदि उन्होंने तुम्हारे ऊपर प्रहार कर दिया तब?" शिष्य ने उत्तर दिया — "यह तो और भी अच्छा होगा भगवन्! मेरे अशुभ कर्मों का शमन स्वतः ही हो जाएगा।"
भगवान बुद्ध आगे बोले — "परंतु यदि उनके प्रहारों से तुम अपने प्राण गँवा बैठे तो?" शिष्य भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर विनीत स्वर में बोले — "प्रभु! यह तो उनकी असीम अनुकंपा होगी। शरीर का मोह ही व्यर्थ है। मैं समझूँगा कि परमात्मा कि यही इच्छा थी।" भगवान बुद्ध उसके सिर पर हाथ रखकर बोले — "पुत्र! तुम धन्य हो! तुम ही वास्तव में प्रव्रज्या के अधिकारी हो; क्योंकि तुम्हारा मन सभी प्रकार के संघर्षों का सामना करने के लिए तैयार हो चुका है। सच्चे लोकसेवी की पहचान सहनशीलता से ही होती है।'
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Monday, January 9, 2023
कल्कि अवतार - 1
यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्भ संस्थापनार्थाय संभवामि युगे—युगे ।।
— श्रीमद् भगवद्गीता (अध्याय 4 : 7, 8)
यह ईश्वर की वाणी है, अगर तुम सुन सकते हो तो सुनो। यह ईश्वर के प्रकटीकरण का वसंत युग है, अगर तुम समझ सकते हो तो समझो। यह प्रभुधर्म की उदयस्थली है, अगर तुम पहचान सकते हो तो पहचानो। यह ईश्वर के आदेशों का एकमात्र स्त्रोत है, अगर तुम में क्षमता है तो इसके सम्बंध में अपना निष्पक्ष निर्णय लो। यह सर्वाधिक प्रकटित तथा अति गोपनीय है, इसे देखो, अगर तुम देख सकते हो। हे विश्व के लोगों! मेरे नाम के अतिरिक्त अन्य सभी नामों को अपने से अलग कर दो, अपनी धन-सम्पत्ति को मुझ पर न्योछावर कर दो और स्वयं को इस महासागर की अनन्त गहराइयों में डुबा दो। इसकी गहराई में विवेक और वाणी के मोती छिपे है। इस सागर में मुझ सर्वकृपालु के नाम की लहरें तरंगित होती है। इस प्रकार का निर्देश तुम्हें उसने दिया है, जो मातृग्रंथ का रचयिता है . . . ।
— बहाउल्लाह
(बहाई लेखों से ली गई है)
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Wednesday, January 4, 2023
प्रेरणादायक कहानी - 1
राजा किसी बात पर अपने मंत्री से क्रोधित हो गया तो उसने उसे राज्य की सबसे ऊँची मीनार पर नजरबंद करवा दिया। उसकी पत्नी बहुत चिंतित हुई कि अब उसके पति का क्या होगा? पर मंत्री पूर्णतया निश्चिंत था। उसने धीरे से अपनी पत्नी से कहा, "तुम बस, रेशम का पतला सूत मेरे पास पहुँचा देना, मैं मुक्त हो जाऊँगा।" यह जानकर पत्नी बहुत आश्चर्यचकित हुई और सोचने लगी कि भला सूत वहाँ तक कैसे पहुँचाया जाए और पहुँचा भी दें तो उससे पति कैसे आजाद होंगे।
इसी उधेडृबुन में वह अपने गुरु के पास पहुँची और उसने उन्हें सारी समस्या बताई। गुरु मुस्कुराए और बोले, "पुत्री! तू एक भृंगी (कीडा़) पकड़कर ला और उसके पैंरों में सूत बाँध दे, फिर उसकी मूँह के बालों पर शहद की बूँद टपकाकर उसे मीनार की चोटी की ओर मुँह करके छौड़ देना।" पत्नी को कुछ समझ में न आया, पर उसने गुरू की आज्ञा का पालन किया। भृंगी शहद की सुगंध का पीछा करते-करते मीनार की सबसे ऊँची मंजिल पर जा पहुँचा। सूत के वहाँ पहुँचने पर उसके सहारे डोरी और डोरी के सहारेरस्सा वहाँ पहुँचाया गया। रस्से का सहारा लेकर मंत्री वहाँ से मुक्त हो गया। साधारण-सी आशा के सहारे जब एक कीडा़ मीनार के बुर्ज तक जा पहुँचा तो मनुष्य तो ज्यादा विभूतियों का स्वामी है, यदि वह ठान ले तो जीवन में एक से बढ़कर एक ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है।
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