सृष्टि के कार्यकलापों पर विचार करें तो हमें ज्ञात होगा कि इसके प्रत्येक अवयव में एक व्यवस्था है। उदाहरण के लिए उस सृष्टि की एक महान रचना सूर्य को देखिये — वह अपने निश्चित समय पर प्रातः क्षितिज से उदित होता हुआ दिखाई देता है और सांयकाल एक निश्चित समय पर अस्त हो जाता है। हर ऋतु में वह एक निश्चित स्थान पर दिखाई देता है जो पृथ्वी पर ऋतुओं की सृष्टि करता है। इसी कारण समय पर ग्रीष्म, वर्षा और तत्पश्चात शरद और हेमन्त आदि ऋतुओं का आगमन होता है। मानव के जन्म पर ही विचार करें तो उसके भी शरीर धारण करने और जन्म लेने की प्रक्रिया में एक व्यवस्था दिखाई देती है। सृष्टि की यही व्यवस्था हमें सोचने को विवश करती है कि इस सम्पूर्ण सृष्टि रचना के पीछे अवश्य ही कोई एक विशाल मस्तिष्क सदैव कार्यरत है। वही स्रष्टा या परमत्मा के नाम से जाना जाता है। उसे हम देख नहीं सकते, मात्र उसकी अपरिमित शक्तियों को देख कर उसकी विद्यमानता का अनुभव कर सकते है। इसी प्रकार हम अनुभव द्वारा यह भी ज्ञात कर सकते हैं कि इस सृष्टि के प्रत्येक कार्यकलाप की पृष्ठभूमि में उस स्रष्टा का निश्चय ही कोई न कोई प्रयोजन है।

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