यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्भ संस्थापनार्थाय संभवामि युगे—युगे ।।
— श्रीमद् भगवद्गीता (अध्याय 4 : 7, 8)
यह ईश्वर की वाणी है, अगर तुम सुन सकते हो तो सुनो। यह ईश्वर के प्रकटीकरण का वसंत युग है, अगर तुम समझ सकते हो तो समझो। यह प्रभुधर्म की उदयस्थली है, अगर तुम पहचान सकते हो तो पहचानो। यह ईश्वर के आदेशों का एकमात्र स्त्रोत है, अगर तुम में क्षमता है तो इसके सम्बंध में अपना निष्पक्ष निर्णय लो। यह सर्वाधिक प्रकटित तथा अति गोपनीय है, इसे देखो, अगर तुम देख सकते हो। हे विश्व के लोगों! मेरे नाम के अतिरिक्त अन्य सभी नामों को अपने से अलग कर दो, अपनी धन-सम्पत्ति को मुझ पर न्योछावर कर दो और स्वयं को इस महासागर की अनन्त गहराइयों में डुबा दो। इसकी गहराई में विवेक और वाणी के मोती छिपे है। इस सागर में मुझ सर्वकृपालु के नाम की लहरें तरंगित होती है। इस प्रकार का निर्देश तुम्हें उसने दिया है, जो मातृग्रंथ का रचयिता है . . . ।
— बहाउल्लाह
(बहाई लेखों से ली गई है)
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