भगवान बुद्ध से उनके एक शिष्य ने प्रार्थना को — "प्रभु! मुझे ऐसे स्थान पर जाने की आज्ञा प्रदान करें, जहाँ के लोग स्वभाव से क्रूर हों।" भगवान बुद्ध ने परीक्षा लेने के उद्देश्य से उससे कहा — "वत्स! वे लोग तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करेंगे, तुम्हें अपशब्द कहेंगे।" शिष्य बोला — "भगवान्! सहन करने से व्यक्तित्व परिष्कृत होता है, मैं उनका उपहार मानूँगा।" भगवान बुद्ध ने पुनः प्रश्न किया — "और यदि उन्होंने तुम्हारे ऊपर प्रहार कर दिया तब?" शिष्य ने उत्तर दिया — "यह तो और भी अच्छा होगा भगवन्! मेरे अशुभ कर्मों का शमन स्वतः ही हो जाएगा।"
भगवान बुद्ध आगे बोले — "परंतु यदि उनके प्रहारों से तुम अपने प्राण गँवा बैठे तो?" शिष्य भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर विनीत स्वर में बोले — "प्रभु! यह तो उनकी असीम अनुकंपा होगी। शरीर का मोह ही व्यर्थ है। मैं समझूँगा कि परमात्मा कि यही इच्छा थी।" भगवान बुद्ध उसके सिर पर हाथ रखकर बोले — "पुत्र! तुम धन्य हो! तुम ही वास्तव में प्रव्रज्या के अधिकारी हो; क्योंकि तुम्हारा मन सभी प्रकार के संघर्षों का सामना करने के लिए तैयार हो चुका है। सच्चे लोकसेवी की पहचान सहनशीलता से ही होती है।'
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