मानवात्मा
क्या उस स्रष्टा की सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य को जन्म देने मैं भी उसका कोई प्रयोजन है? अथवा निष्प्रयोजन ही इस धरती पर उसकी सृष्टि की गई है। गहराई से इस पर विचार करें तो हमें ज्ञात होगा कि उस नियन्ता का मानव को इस संसार में जन्म देने, उसे एक निश्चत जीवन देने और अन्त में मृत्यु द्वारा उहका वह शरीर भी नष्ट कर देने में अवश्य ही कोई बहुत ही बडा़ प्रयोजन है। निश्चय ही इस नश्वर शरीर से परे भी कोई वस्तु है जो इसके नाश होने पर भी नष्ट नहीं होती है। वह है "मानवात्मा" जो कभी मरती नहीं, जलती नहीं, कभी नष्त नहीं होती। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है :
नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।। 2-23।।
धर्म का प्रयोजन
यही 'मानवात्मा' इस संसार में मनुष्य शरीर धारण करके अनेकानेक भोगों को भोगती है। ईश्वरेच्छा से ही उसे जीवन-यापन के अनेक साधन उपलब्ध कराये जाते हैं किन्तु उसका साध्य कुछ और ही है जो अत्यन्त ही महत्वपूर्ण और महान है। वह है इस संसार में कर्मों के द्वारा उस आत्मा की निरन्तर आध्यात्मिक उन्नति, जो उसे उसके परम लक्ष्य 'भगवद्प्राप्ति' में सहायक हो सके। जब-जब मनुष्य इस संसार के भौतिक प्रलोभनों में फंस पथ-भ्रष्ट होकर अपने इस चरम लक्ष्य को विस्मृत कर देता है तब-तब धर्म ही एक ऐसा साधन है जो उसे दिशाहीन होकर भटकने से रोकता है, उसका पथ निर्दिष्ट करता है और लक्ष्य प्राप्ति में उसका सहायक होता है।
(source: Kalki Avatar by Prakash Narayan Mishra)
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