Wednesday, March 1, 2023

ईश्वर का अस्तित्व (3)

 धर्म संस्थापक

धर्म का यह पथ मनुष्य स्वयं ढूँढ़ने में असमर्थ है। उसके भौतिक चक्षु उसकी खोज में, उसकी तुच्छ बुद्धि उसे जानने, समझने और इसके अनुकूल चलने में सर्वथा असमर्थ है। अतः ईश्वर ने मनुष्य को इस सम्बन्ध में असहाय और अकेला नहीं छोडा़ है। जिस प्रकार उसने मनुष्य की भौतिक सुख-शांति के लिए इस जगत में अनेकानेक पदार्थों की सृष्टि की है उसी प्रकार उसकी आध्यात्मिक उन्नति में उसकी सहायता करने, उसे सही दिशा देने का भी उसने प्रबन्ध किया है। उसने मानव जगत को वचन दिया है कि जब-जब संसार में धर्म की ग्लानि होकर अधर्म और पाप बढ़ जाएगा, तब-तब धर्म की रक्षा करने, उसका संस्थापन करने इस संसार में उसका प्रकटीकरण होता रहेगा। गीता में भगवान कृष्ण ने जगत को यही वचन दिया है :

      यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानर्भवति भारत ।
      अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यह्म ।।7।।
      परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम ।
      धर्मसंस्थापनार्थय सम्भवामि युगे युगे ।।8।।
                                  श्रीमद्भगवद् गीता (अध्याय 4)



दैवी शिक्षक

मानव- जगत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि इस पृथ्वी पर सदैव ही ये दैवी शिक्षक आते रहे हैं। प्राचीन धार्मिक ग्रंथ इस बात को प्रमाणित करते हैं कि सृष्टि के आदि काल से ही ईश्वरीय अवतार इस पृथ्वी पर प्रकट होते रहे हैं। मानव सृष्टिकी उत्पत्ति पर हम विचार करें तो हमें ज्ञात होगा कि इस पृथ्वी का सम्पूर्ण मानव-समुदाय एक ही पिता की सन्तानों के रूप में पृथ्वी पर बसा हुआ है। प्राचीन हिन्दू ग्रंथ इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि और उनके पुत्र कश्यप ऋषि ही सम्पूर्ण मानव वंशों के पिता थे। उनकी तेरह पत्नियों से कतिपय मानव वंशों की उत्पत्ति हुई है। पुराणाख्याओं में दिति नाम की पत्नी के दैत्य, अदिति के आदित्य और दनु के दानव आदि मानवों की उत्पत्ति का इतिहास दिया हुआ है। इन्हीं मानव वंशों को इस पृथ्वी पर तीन लोकों में बसाया गया था जिन्हें 'त्रिलोकी' कहा गया है। जिस समय ये मानव वंश एक ही स्थान पर निवास करते थे तब उनका एक ही परिवार और उसी प्रकार उनका एक ही दैवीशिक्षक अथवा धर्म संस्थापक था।



(source: 'Kalki Avatar' by Mr. Prakash Narayan Mishra)

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